करुणासिन्धु भगवान् श्री-कृष्ण

दूसरों के दुख या कष्टों को दूर करने की तीव्र इच्छा करुणा कहलाती है , और जो व्यक्ति दूसरों के कष्टों को सहन न कर पाए उसे करुणामय कहा जाता है | शास्त्रों में ऐसे अनेक करुणामय लोगों का वर्णन मिलता है जिन्होंने अपनी करुणा से मानव-मस्तिष्क पर एक गहरी छाप छोड़ी है |

श्रील रूप गोस्वामी अपनी पुस्तक भक्तिरसामृतसिन्धु में भगवान् श्री-कृष्ण के चौसठ अदभुत गुणों का वर्णन करते हैं | करुणा उनमे से एक है | श्री-कृष्ण के अंश होने के नाते जीवात्मा को भी उनके इस गुण का एक अंश भेंटस्वरूप प्राप्त होता है  | जब तक जीवात्मा इस संसार के तीन गुणों से प्रभावित रहता है उसकी अन्तर्निहित करुणा आच्छादित रहती है | श्री-कृष्ण करुणा के सागर हैं I लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व धरती पर अवतार लेकर उन्होंने 125 वर्षों तक यहाँ लीलाएं की | उनकी ये लीलाएं उनकी करुणा के जीते-जागते उदाहरण हैं |

कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भी श्री-कृष्ण की करुणा अत्यंत अदभुत थी I यद्यपि बाह्य दृष्टि से वे केवल अर्जुन के सारथी थे , छिपे वेश में वे मूर्तिमान करुणा थे I करुणाभरे अपने दृष्टिपात से उन्होंने युद्धभूमि में शरीर त्यागने वाले प्रत्येक योद्धा को भौतिक बंधन से मुक्त के दिया  | युद्ध के आरम्भ में अपने सम्बन्धियों को शत्रुपक्ष में खड़े देखकर अर्जुन भ्रमित हो गए | उस समय श्रीकृष्ण ने करूणावश उन्हें गीता के उपदेश देकर उनका भ्रम दूर किया और अर्जुन के माध्यम से सम्पूर्ण मानव-जाति को अपनी करुणा की यह भेंट दी |

अपनी उत्कट करूणावश उन्होंने सन १५८६ में स्वयं अपने भक्त का वेश लेकर श्रीचैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए और अड़तालीस वर्ष धरती पर लीलाएं कर कृष्ण भक्ति का आदर्श उदाहरण स्थापित किया I उन्होंने कलिसंतरण उपनिषद  में वर्णित हरे-कृष्ण महामन्त्र लिया और कलियुग के पतित जीवों के उद्धारार्थ उसका प्रचार किया |

कटवारिया सराय हरे-कृष्ण सेंटर से जुडी एक माताजी का नाम है : श्रीमती परमेश्वरी – रूप माताजी , जिनका अत्यंत करुणामय स्वभाव अंतर्द्विप के भक्त समाज की शोभा है |  इनका सर्वोपरि उद्देश्य यह रहता है कि , आध्यात्मिक जीवन में जो भी भक्त अपनी इच्छा स्वरूप प्रगति करना चाहता है , उसे प्रेम और सम्मान  इस प्रकार परिपूर्ण कर दिया जाये जिससे वह भक्त हरे-कृष्ण आन्दोलन में जुड़कर अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर पाए |

माताजी का आध्यात्मिक जीवन तब प्रारंभ हुआ जब उनका विवाह श्रीमान अनिरुद्ध केशव प्रभु से २८ जून , २००९ में हुआ |  विवाह के पश्चात , माताजी को कुछ विशेष अनुभव होने लगे … उनको ऐसा लगने लगा जैसे भक्तिमय जीवन एक अलग ही दुनिया है , मानो बहुत कुछ भगवान् से सम्बंधित है जानने और अनुभव करने को , जो बाह्य दृष्टि से बिलकुल परे है |  जब उनको इस्कान संस्था का आश्रय मिला , तो उनको एक अदभुत संतुष्टि महसूस होने लगी , जो पहले कभी उन्होंने अनुभव नहीं की थी I शायद ये भी भगवान् श्री-कृष्ण की एक विशेष व्यवस्था थी !

यह मई २०११ की बात है जब उन्होंने अंतर्द्वीप में श्रीमान सर्वप्रिय प्रभु द्वारा दिया गया प्रवचन का श्रवण किया |

माताजी को ऐसा अनुभव हुआ मानो वह पूरा प्रवचन उनके लिए ही बोला जा रहा हो … मानो भगवान् स्वयं उनके भक्तिमय जीवन की डोर खीँच रहे हों |  इसके अलावा , वह श्रीमान सर्वप्रिय प्रभु के आचरण से बहुत प्रभावित हुई |  उनको यह लगा की यहाँ एक व्यक्ति है जिसने सब कुछ होते हुए , अपना सर्वस्व , श्री-गुरु और श्री-कृष्ण के चरणों में समर्पित किया है |  इससे यह आशय स्पष्ट होता है कि उनको भगवान् की सेवा से उच्चतम आनंद , अर्थात , आध्यात्मिक आनंद प्राप्त हो रहा है जो भौतिक दृष्टि से कोसों दूर है |

भक्तों के सानिध्य में रहते हुए और भक्तिमय जीवन के विधि-विधानों का पालन करते हुए , क्रमशः ,  माताजी का भक्तिलता बीज अंकुरित होने लगा और ३० जनवरी ,२०१५ , में परम-पूज्य गोपाल-कृष्ण गोस्वामी द्वारा आध्यात्मिक दीक्षा प्राप्त हुई I दीक्षा के पश्चात उनकी हरिनाम लेने में रूचि और भी तीव्र हुई है |

माताजी अपने आध्यात्मिक जीवन में प्रगति का श्रेय अपने पति ( श्रीमान अनिरुद्ध केशव प्रभु ) को देती है जिन्होंने उन्हें भगवान् से जोड़ा है , और हर कठिन समय और विपत्ति में उनका पूरा साथ दिया है |

माताजी को मायापुर धाम के श्री-श्री राधा-माधव विग्रह अत्यंत प्रिय हैं I उनको वहाँ कीर्तन-मेले में भाग लेना अच्छा लगता है |

माताजी के भक्तिमय जीवन का एक ही उद्देश्य है , कि जो कृपा और स्नेह उन्हें भगवान् के भक्तों द्वारा प्राप्त हुई है , वही करुणा और प्रेम , भक्ति के मार्ग पर चलने वाले लोगों को बांटे |

श्री-कृष्ण करुणा के सागर हैं और उनका अंश होने के कारण हमारे ह्रदय में करुणा का गुण विद्यमान है I हमें केवल उसके ऊपर जमी अविद्या की परतों को हटाकर उसे उजागर करना है |

हरे-कृष्ण !