स्थितप्रज्ञ कौन है !

आभार : H.G. RASRAJ PRABHU

मन है पूजा पर और ध्यान है  भूजा  पर !!

( शास्त्र के अनुसार यहाँ पर मन आपके उस कर्तव्यबोध को दर्शाता है जिससे आप जरुरी कार्य करते है, और यहाँ पे ध्यान मन की स्थिति को दर्शाता है जो भटकता है !  )

श्लोक संख्या भगवत गीता २.५४ से हरी इक्छा तक …….

अर्जुन उवाच :- स्थित प्रज्ञ वयक्ति की क्या पहचान है, वो कैसे बोलता है कैसे बैठता है और कैसे चलता |

श्री भगवान उवाच :- हे पार्थ ! जब मनुष्य मनोधर्म से उत्पन्न होने वाली इन्द्रियतृप्ति की समस्त कामनाओं का परित्याग कर देता है और जब इस तरह से विशुद्ध हुआ उसका मन आत्मा में सन्तोष प्राप्त करता है तो  वह विशुद्ध चेतना को प्राप्त ( स्थितप्रज्ञ ) कहा जाता है |

वैसे तो  भगवत गीता में सारे विषय ही प्रासंगिक हैं , आइये उनमे से एक बहुत प्रासंगिक विषय पर चर्चा करते हैं,  चलिए आपको घटना स्थल पर ले कर चलते है

एक बार एक व्यक्ति ( काल्पनिक नाम रमन बाबु ) पढाई कर रहे थे,  आँखे किताब पे जमी हुई थी तभी अचानक बाज़ार से आवाज आती है

“ आइसक्रीम पर भारी छुट “

“ यह सेल सिर्फ आज के लिए … ७० ( सतर ) का आइसक्रीम आज सिर्फ ३५ ( पैतीस ) रूपये में मिल रहा है “

“ आईये .. आईये और खाइये “

बस यही पे यह बात

“ मन है पूजा पर और ध्यान है भुजा पर ”

चरितार्थ हो जाती है…..

रमन बाबु कहाँ किताब देख रहे थे और अब यहाँ ध्यान सेल पे है, सोचते है की ले लूँ क्या ..

ले हीं लेता हूँ …..

और बस किताब बंद और कहते है

रमन बाबु : एक मिनट भैया अभी आया …………………

ये जो उठे आप बस आप गये …. उस समय का सर्वनाश, सत्यानाश हो गया ……

अब उठेंगे वहां जायेंगे … फिर वहां का माहौल देखेंगे …. चारो ओर बहुत सारी वैरायटी होती है उसको देखेंगे … फिर

ये देना मैनू  …..

नहीं मुझे ये .. नहीं वो चाहिए …..

अच्छा वो वाला नहीं है ……ओके

ये तो आधा टुटा हुआ है …..

ये क्या है … तोते ने खाया है … अच्छा चल यही दे दो मेरे को …

…………………

तो …………… इन्द्रिय तृप्ति से उत्पन्न जो इच्छाएं हैं उसके चक्कर में हम गए गए… आपका पढने का काम छुट गया ….  ऐसा व्यक्ति कभी स्थितप्रज्ञ नहीं हो सकता |

तो बताया जाता है की क्या करना चाहिए …  जब इस तरह का डिमांड हो उस समय मन को ठगना परता है  … मन को क्या कहना चाहिए

“ ये तो मुझे अभी ५०% दे रहा है .. अभी एक घंटा पढ़ लेते हैं उसके बाद उठेंगे तो इसका डब्बल खरीदेंगें .. शो रूम में जा कर …..

ये तो मिडल साइज़ का पिस दे रहा है … शो रूम में जाकर बड़ा वाला बार ले कर आयेंगे .. पुरे परिवार के लिए ….. बिच से उसको काटेंगे और पेट भर कर प्लेट में उसको चावल की जगह रख कर खायेंगे | ”

ऐसे कर मन को प्रलोभन देना परता है |

कुछ लोग जो दिन रत शराब पिटे हैं वो ये सोचते है की आज लास्ट है  …. आज लास्ट है कल से नहीं पियेंगे ….

उसके बाद क्या होता है वो शपथ जो है वो टूट जाता है |

ऐसे व्यक्ति को क्या करना चाहिए … उसको थीम बदल देना चाहिए …कहना चाहिए

आज लास्ट है …. आज रोक लेते है कल से शुरू करेंगें !

अगर आपने रोक लिया तो फिर कल नहीं आयेगा

अगर आपने आइसक्रीम वाले को इग्नोर कर दिया थोरे देर के लिये …. ये कह कर की

“ पहले एक घंटा पढ़ लेते हैं उसके बाद लेंगे “ तो फिर जैसे हीं एक घंटा गुजरेगा तो आपका मन नहीं करेगा आइसक्रीम खाने के लिये |

आपका मन कहेगा

“ आब पराठा खाऊंगा “ कुछ और मन करेगा

तो इस तरह उससे तो आप बच गये … इसको कहते है “ Delaying of the senses “

आपने तरफ से क्या करना चाहिए हमें मामला खिसका देना चाहिए …..

जब भी मन कुछ मांगे हमें देने में delay कर देना चाहिए, परन्तु हमारी समस्या क्या है की मन कुछ मांगता है नहीं की पट उसे हम दे देते हैं |

जैसे मजदूर काम करते है न … कहीं उचिं बिल्डिंग की दीवाल पर बांस लगा कर लटके रहते है

और आचानक वहीँ उनका मन करता है की बिड़ी पिने का ..

पि लें क्या …

चल पि लेते हैं … निकाल

ओर वो वही शुरू हो जाता है .. वो लटका हुआ है और वहीँ पैर पीना शुरू कर दिया|

इच्छा हुई और वही पे प्रैक्टिकल करना शुरू कर दिया |

भगवान कहते हैं की मनोधर्म से उत्पन इच्छाओं को हमे रोकना चाहिए .. कम से कम उस समय तो जरूर रोकना चाहिए .. Delay कर देना चाहिये,  आधे से उपर कम तो वहीँ पे हो जायेगा |

ऐसे लोग जो इस प्रकार से उसको रोक देने में delay कर देने में सक्षम हैं वो स्थितप्रज्ञ हैं |

अगर करना भी पड़े तो किसके लिए करना चाहिये … आत्मा के लिये …. खरीद कर लाईये और भगवान को भीग लगा कर फिर खाना चाहिये |

 

आगे भगवान कहते है की स्थितप्रज्ञ कौन है ………

कहते है की जो तिन प्रकार के तापों को सहना सिख जाता है वो स्थितप्रज्ञ हैं ….

सहन करने से पहले यह सीखना परेगा की तिन ताप होते क्या हैं

आधीदैविक : प्रकृति के द्वारा दिया गया कष्ट

आधीभौतिक : दूसरों के द्वारा दिया गया कष्ट

अध्यात्मिक : स्वयं के द्वारा दिया गया कष्ट

जो इन तिन तापों को जनता हैं और इन सब को सह लेता है वो स्थितप्रज्ञ है | जो ये जानता है की ये होगा ही होगा और इसको कोई रोक नहीं सकता .. जैसे ये गर्मी है … होगी हीं होगी .. इसको कोई रोक नहीं सकता …. इसको सहन करते हैं |

जैसे अगर ऑफिस जाना है और बारिश हो रही हैं … पर आपको जाना है तो थोरे हीं ऐसे हीं निकाल जाते हैं … या तो रेनकोट पहन कर निकलते हैं या फिर छाता ले कर निकलते हैं ..

तो बरसात के बिच में बरसात से बच कर चलते हैं ……

ह्म्म्म … बरसात में तो है न .. ऐसा तो नहीं है की बरसात छोड़ कर भाग गये …..

बरसात के बिच में बरसात से बच कर चलते हैं … और ऐसा भी नहीं है की घर में हाथ पे हाथ रख कर बैठे हैं |

उसी तरह ये तिन प्रकार के ताप तो आयेंगे ही आयेंगे .. हमे इनका सामना करना चाहिए …. और जो ये सिख ले वो स्थितप्रज्ञ है | आसक्ति, काम और क्रोध ये भी रोकना है |

 

अब अगला लक्षण भगवान बताते हैं की जो सुख में बहुत ज्यादा सुखी नहीं होता और दुःख में बहुत ज्यादा दुखी नहीं होता वो स्थितप्रज्ञ है |

ये भी एक लक्षण है ……… जैसे

जब कोई एग्जाम देता है और एक्जाम बुरा होता है … तो बस खाना बंद .. अब कोई कहे

खा लो प्रभु …. क्या हो गया प्रसाद नहीं पा रहे क्या प्रॉब्लम है ….

प्रभु जी मन नहीं कर रहा है ….. सोच रहा हूँ की रेस्ट कर लूँ  |

तो दुखी हो गये क्वालीफाई नहीं कर पाए तो

या फिर बहुत अच्छा नंबर आ गया

तो दस रोटी खा रहें है ……….रोटी के अन्दर पनीर को ठूस के खा रहे है … क्यों क्यूंकि पराठे का स्मरण हो रहा है |

तो बहुत बढ़िया हुआ तो खूब खा रहें , पि रहें हैं, गोल गोलाही हो के घूम रहे हैं ….

बुरा हो गया तो एक कोने में बैठ गये.. किसी से कुछ बातचित कुछ नहीं कर रहें हैं |

बहुत ज्यादा डिस्टर्बिंग मोड में चले गये .. अन्दर से पुरे विचलित हो गये |

होना तो ये चाहिए की दोनों स्थिति में एक जैसे रहें … इसी को successful कहते हैं |

कुछ लोग पूछते हैं सफल व्यक्ति की पहचान क्या है ….. ये की जो सफल दुकान से सब्जी ले आये

नहीं …. सफल व्यक्ति की पहचान ये है की वो किसी भी परिस्थिति में एक सामान रहे |

उतना ही खाये जितना पहले खाता था .

प्रभु रिजल्ट आ गया है … सुना है आपका नंबर ख़राब आया है….

हें.. हें हें … आब क्या बताये प्रभु लगता है कुछ समस्या हो गई है ( खाते हुए ) अब एक साल फिर से तैयारी करना परेगा |

दुःख नहीं लग रहा है …

अब क्या कर सकते है

उसी के साथ जो पास कर गया  है वो भी खा रहा है…

अरे प्रभु मैंने सुना है आप पास कर गये है ….

प्रभु पता नहीं कैसे हो गया … मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा है ( खाते हुए )

ऐसे होने चाहिए लोग …. इसको कहते है सफल व्यक्ति …. हाँ प्रयास करना चाहिए … बाकि आपके पहुच के बहार है |

जैसे ध्रुव महाराज … जब उनको कटु वचन बोला तो ऐसा नहीं की बहुत ज्यादा विचलित हो गये… उनको भगवान के दर्शन करने थे …..

और ऐसा भी नहीं है की … भगवान का दर्शन कर लिए तो पूरी दुनिया में ढोल ले के पिट रहे है की भाई मैंने तो भगवान का दर्शन कर लिया है |

दोनो समय वो स्थितप्रज्ञ रहे … पहले भी उनको भगवान को पाने की इच्छा थी बाद में भी उनको भगवान को पाने की इच्छा थी |

तो ये होते हैं स्थितप्रज्ञ …..!

 

आगे और भी है अगले ब्लॉग में थोड़ा इंतजार करीए … और तब  तक  भूजा से ध्यान हटाते हैं … :-)

हरे कृष्णा

आपका दास

अशेष प्रकाश दास